— विजय उरांव
भारत में “आदिवासी” और “वनवासी” शब्दों को लेकर दशकों से बहस चल रही है। यह बहस केवल दो शब्दों की नहीं, बल्कि पहचान, इतिहास, संस्कृति और दृष्टिकोण की बहस है। लंबे समय से आदिवासी समाज का एक बड़ा वर्ग यह कहता रहा है कि उन्हें “वनवासी” नहीं, बल्कि “आदिवासी” कहा जाए। अब इस बहस में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का एक वक्तव्य महत्वपूर्ण संदर्भ बन गया है।
ब्रह्माकुमारी संस्था के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा,
“हम जनजाति को आदिवासी कहते हैं। कोई-कोई उनको वनवासी कहते हैं। ये आदिवासी हैं। आदिमों के आदिवासी तो सृष्टि के आरंभ से ही इस धरा पर रहते हैं। उनकी जीवनशैली आध्यात्मिकता से भरी हुई है। वे प्रकृति की पूजा करते हैं।”
राष्ट्रपति ने कहा कि “कोई-कोई वनवासी कहते हैं”, लेकिन तुरंत स्पष्ट करते हुए कहा—“ये आदिवासी हैं।”
देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठी पहली आदिवासी राष्ट्रपति का यह शब्द चयन सामान्य नहीं माना जा सकता। राष्ट्रपति अपने सार्वजनिक भाषणों में शब्दों का चयन अत्यंत सावधानी से करती हैं। ऐसे में जब उन्होंने स्वयं “आदिवासी” शब्द का प्रयोग किया, तो यह केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि पहचान का प्रश्न भी बन गया।
आखिर विवाद क्या है?
“आदिवासी” और “वनवासी” शब्दों के बीच का विवाद नया नहीं है। अनेक आदिवासी संगठनों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक आंदोलनों का मानना है कि “वनवासी” शब्द उनकी ऐतिहासिक पहचान को बदलने का प्रयास है।
“आदिवासी” का अर्थ है—इस भूमि के आदि या मूल निवासी।
जबकि “वनवासी” का शाब्दिक अर्थ है—वन में रहने वाला।
यही अंतर इस बहस का मूल है। आदिवासी समाज का तर्क है कि उनकी पहचान केवल जंगल में रहने वाले समुदाय की नहीं है। उनकी अपनी सभ्यता, शासन व्यवस्था, भाषाएँ, धार्मिक परंपराएँ, ज्ञान प्रणाली और सांस्कृतिक विरासत रही है। इसलिए उनकी पहचान को केवल “वन” तक सीमित करना उनके इतिहास को सीमित करना है।
राष्ट्रपति के शब्द क्यों महत्वपूर्ण हैं?
द्रौपदी मुर्मू स्वयं आदिवासी समाज से आती हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक यथार्थ के बीच बिताया है। इसलिए जब वे आदिवासी पहचान पर बोलती हैं, तो उनके शब्दों का महत्व और बढ़ जाता है।
उन्होंने अपने भाषण में आदिवासी समाज को इस धरती का आदि निवासी बताया। उन्होंने कहा कि उनकी जीवनशैली आध्यात्मिकता से भरी हुई है और वे प्रकृति की पूजा करते हैं। यह वर्णन केवल सांस्कृतिक प्रशंसा नहीं था, बल्कि आदिवासी जीवन-दर्शन की सार्वजनिक स्वीकार्यता भी थी।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि राष्ट्रपति ने “वनवासी” शब्द का उल्लेख करने के बाद उसी शब्द को आगे नहीं बढ़ाया। उन्होंने स्पष्ट कहा—“ये आदिवासी हैं।”
शब्दों की राजनीति
भारत में शब्दों की अपनी राजनीति रही है। “हरिजन” से “दलित”, “अछूत” से “अनुसूचित जाति” और अब “वनवासी” बनाम “आदिवासी”—हर शब्द अपने साथ एक विचार लेकर चलता है।
इसी कारण किसी समुदाय को किस नाम से पुकारा जाए, यह केवल भाषाई विषय नहीं रह जाता, बल्कि सम्मान, इतिहास और अधिकारों का प्रश्न बन जाता है।
दशकों से आदिवासी समाज इस बात पर जोर देता रहा है कि उनकी पहचान वही होनी चाहिए, जिसे वे स्वयं स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि देशभर के अधिकांश आदिवासी संगठन, लेखक, शोधकर्ता और सांस्कृतिक मंच “आदिवासी” शब्द का प्रयोग करते हैं।
क्या राष्ट्रपति का संदेश प्रतीकात्मक है?
राष्ट्रपति किसी राजनीतिक दल की प्रवक्ता नहीं होतीं। उनसे किसी विचारधारा पर प्रत्यक्ष टिप्पणी की अपेक्षा भी नहीं की जाती। लेकिन संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के शब्द और उनके द्वारा चुनी गई भाषा स्वयं एक संदेश होती है।
द्रौपदी मुर्मू ने किसी विवाद में प्रवेश नहीं किया। उन्होंने किसी संगठन का नाम नहीं लिया। उन्होंने किसी पर टिप्पणी नहीं की। उन्होंने केवल इतना कहा—
“कोई-कोई उनको वनवासी कहते हैं… ये आदिवासी हैं।”
यही वाक्य आज की पूरी बहस का केंद्र बन गया है।
आदिवासी अस्मिता की नई आवाज
राष्ट्रपति का यह वक्तव्य ऐसे समय आया है जब देश के कई हिस्सों में आदिवासी धर्म, संस्कृति, भाषा और पहचान को लेकर नई बहसें चल रही हैं। सरना धर्म कोड की मांग हो, पारंपरिक धार्मिक स्थलों की सुरक्षा का सवाल हो या आदिवासी इतिहास को लेकर विमर्श—हर जगह पहचान का प्रश्न प्रमुख है।
ऐसे समय में देश की राष्ट्रपति द्वारा “आदिवासी” शब्द का स्पष्ट प्रयोग आदिवासी समाज के लिए एक महत्वपूर्ण नैतिक और प्रतीकात्मक महत्व रखता है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का वक्तव्य केवल एक भाषण नहीं, बल्कि पहचान के प्रश्न पर एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जाएगा।
उन्होंने कहा कि “कोई-कोई वनवासी कहते हैं”, लेकिन स्पष्ट करते हुए कहा—“ये आदिवासी हैं।”
देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति के ये शब्द उस लंबे संघर्ष को नई ऊर्जा देते हैं, जिसमें आदिवासी समाज वर्षों से अपनी पहचान को अपने ही नाम से स्वीकार किए जाने की मांग करता रहा है।
यह केवल एक शब्द का प्रश्न नहीं है। यह इतिहास, अस्मिता और आत्मसम्मान का प्रश्न है। और शायद यही कारण है कि राष्ट्रपति के इस वक्तव्य को आने वाले समय में “आदिवासी” बनाम “वनवासी” की बहस का एक महत्वपूर्ण संदर्भ माना जाएगा।





