रथ यात्रा में पेड़ लगाने की परंपरा क्यों है? क्या हमारे पूर्वज पर्यावरण विज्ञान को हमसे बेहतर समझते थे?

हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं। लेकिन एक सवाल शायद ही कभी पूछा जाता है—क्या पेड़ लगाने का यही सबसे सही समय है?

झारखंड के रांची और आसपास के इलाकों में सदियों से एक अलग परंपरा चली आ रही है। यहां लोग रथ यात्रा के दौरान पेड़, पौधे या उनकी टहनियां (कलम) लगाते हैं। यह परंपरा किसी सरकारी अभियान का हिस्सा नहीं है, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही लोक परंपरा है।

दिलचस्प बात यह है कि रथ यात्रा आषाढ़ के महीने में आती है, जब मानसून धरती को सींचना शुरू कर देता है। इसके विपरीत, 5 जून अक्सर भीषण गर्मी के बीच पड़ता है, जब नए पौधों के जीवित रहने की चुनौती सबसे अधिक होती है।

तो क्या यह केवल एक धार्मिक परंपरा है, या फिर इसके पीछे स्थानीय समाज की प्रकृति, मौसम और कृषि चक्र की गहरी समझ छिपी है? क्या रथ यात्रा के साथ जुड़ा वृक्षारोपण हमें यह बताता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल पेड़ लगाने का नाम नहीं, बल्कि सही समय पर पेड़ लगाने की बुद्धिमत्ता भी है?

आइए, रथ यात्रा, मानसून और झारखंड की इस अनोखी लोक परंपरा की कहानी को समझने की कोशिश करते हैं।

जब धर्म और मौसम साथ चलते हैं

विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून को मनाया जाता है। इस समय उत्तर और पूर्वी भारत में प्रायः ज्येष्ठ का महीना होता है। तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। मिट्टी सूखी होती है और यदि पौधों की नियमित सिंचाई न हो तो उनके जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है।

See also  Top 10 Cherry Blossom Destinations Across the Globe

इसके विपरीत रथ यात्रा आषाढ़ महीने में होती है। यह वह समय है जब मानसून की वर्षा शुरू हो चुकी होती है या शुरू होने वाली होती है। मिट्टी में नमी आ जाती है, तापमान कम हो जाता है और पौधों की जड़ें तेजी से फैलने लगती हैं। यही कारण है कि कृषि वैज्ञानिक भी अधिकांश वृक्षारोपण मानसून के दौरान करने की सलाह देते हैं।

इस दृष्टि से देखें तो स्थानीय समाज ने बहुत पहले ही वृक्षारोपण का ऐसा समय चुन लिया था जो प्रकृति के अनुकूल था।

रथ यात्रा और गांव की परंपरा

रांची, खूंटी, गुमला, लोहरदगा और आसपास के अनेक गांवों में लंबे समय से यह परंपरा रही है कि रथ यात्रा के अवसर पर लोग केवल मेले में नहीं जाते, बल्कि अपने घर लौटकर पेड़ या पौधों की टहनियां भी लगाते हैं।

कहीं आम, कटहल, जामुन, पीपल या बरगद लगाए जाते हैं, तो कहीं सहजन, करंज, नीम या अन्य स्थानीय प्रजातियों की कलम रोपी जाती है।

कई परिवार इसे शुभ कार्य मानते हैं। कुछ इसे नई शुरुआत का प्रतीक मानते हैं, जबकि कई स्थानों पर इसे अच्छी वर्षा, हरियाली और समृद्धि से जोड़ा जाता है।

संभव है कि अलग-अलग गांवों में इसके कारण अलग हों, लेकिन परिणाम एक ही है—हर वर्ष मानसून की शुरुआत के साथ नए पेड़ धरती पर स्थापित हो जाते हैं।

See also  हवा में उड़ता है, मछली की तरह तैरता है यह समुद्री तोता

क्या इसका संबंध जगन्नाथ से भी है?

रथ यात्रा का मूल संबंध भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की यात्रा से है। लेकिन छोटानागपुर में रथ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन बनकर नहीं रही।

जब यह परंपरा यहां पहुंची तो इसका मेल स्थानीय आदिवासी और सदानी समाज की जीवनशैली से हुआ। यही कारण है कि रथ यात्रा के साथ मेला, कृषि की तैयारी, वर्षा का स्वागत और वृक्षारोपण जैसी स्थानीय परंपराएं भी जुड़ती चली गईं।

यह भारतीय लोक संस्कृति की एक विशेषता है कि बाहरी धार्मिक परंपराएं स्थानीय संस्कृति से संवाद करती हैं और समय के साथ नया स्वरूप ग्रहण कर लेती हैं।

प्रकृति का कैलेंडर

आज हम पर्यावरण संरक्षण के लिए अलग-अलग अभियान चलाते हैं। लेकिन पुराने ग्रामीण समाज के पास अपना “प्राकृतिक कैलेंडर” था।

  • पहली वर्षा आए तो खेत तैयार करो।
  • आषाढ़ आए तो पेड़ लगाओ।
  • सावन में उनकी देखभाल करो।
  • भादो तक जड़ें मजबूत हो जाएंगी।

इस कैलेंडर में वैज्ञानिक शब्द नहीं थे, लेकिन अनुभव था। मौसम का अवलोकन था। पीढ़ियों का संचित ज्ञान था।

परंपरा में छिपा पर्यावरण विज्ञान

आज यदि कोई व्यक्ति 5 जून को पौधा लगाकर उसकी देखभाल न करे, तो उसके सूखने की संभावना अधिक रहती है।

लेकिन यदि वही पौधा रथ यात्रा के आसपास लगाया जाए, तो लगातार होने वाली वर्षा उसे प्राकृतिक सिंचाई उपलब्ध कराती है। इससे पौधे के जीवित रहने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

See also  Tulsi Gowda: The Guardian of Forests Who Lives On Through Her Legacy

इसलिए केवल वृक्षारोपण करना पर्याप्त नहीं है। सही समय पर वृक्षारोपण करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

क्या हमें इस परंपरा से सीखना चाहिए?

विश्व पर्यावरण दिवस का महत्व जागरूकता फैलाने में है। लेकिन वास्तविक वृक्षारोपण कार्यक्रमों को स्थानीय जलवायु के अनुसार आयोजित किया जाए तो उनका प्रभाव अधिक होगा।

झारखंड जैसे राज्यों में मानसून के आरंभ के साथ वृक्षारोपण करना अधिक व्यावहारिक और टिकाऊ है। संभव है कि हमारे पूर्वजों ने बिना किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला के, केवल प्रकृति को देखकर यह बात समझ ली थी।

रथ यात्रा के अवसर पर पेड़ लगाने की परंपरा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं दिखती। यह मौसम, कृषि, पर्यावरण और सामुदायिक जीवन के गहरे संबंध का उदाहरण भी हो सकती है।

हालांकि इस परंपरा की उत्पत्ति पर अभी विस्तृत ऐतिहासिक शोध की आवश्यकता है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इसने वृक्षारोपण को वर्ष के सबसे उपयुक्त समय से जोड़ दिया। आज जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण वैश्विक चिंता का विषय हैं, तब ऐसी स्थानीय परंपराओं का पुनर्मूल्यांकन करना आवश्यक है।

संभव है कि आधुनिक पर्यावरण अभियानों को अधिक सफल बनाने का उत्तर किसी नई तकनीक में नहीं, बल्कि उन लोक परंपराओं में छिपा हो जिन्हें गांवों ने सदियों से जीवित रखा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

10 most Expensive cities in the World धरती आबा बिरसा मुंडा के कथन