सरना कॉलम कोड नहीं तो आदिवासी महादलितों से भी बदतर स्थिति में पहुंचेंगे: गीताश्री उरांव

रांची। अखिल भारतीय आदिवासी परिषद की अध्यक्ष और झारखंड की पूर्व शिक्षा मंत्री गीताश्री उरांव ने प्रस्तावित जनगणना में सरना धर्म के लिए अलग कॉलम कोड न होने पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आदिवासियों को उनकी मूल धार्मिक पहचान के साथ दर्ज नहीं किया गया, तो आने वाले समय में आदिवासियों की स्थिति महादलितों से भी बदतर हो सकती है।

गीताश्री उरांव ने कहा कि जनगणना में सरना धर्मालंबियों को हिंदू, ईसाई, मुस्लिम, सिख, बौद्ध या जैन में से किसी एक विकल्प को चुनने के लिए मजबूर किया जाना, आदिवासी अस्तित्व को मिटाने की साजिश है। उन्होंने कहा कि इससे आदिवासियों की पहचान, इतिहास, संस्कृति और संवैधानिक अधिकार गंभीर खतरे में पड़ जाएंगे।

उन्होंने बताया कि सरना समाज के लोग लगातार उन्हें फोन कर अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि अलग कॉलम कोड नहीं मिला तो आदिवासी धर्म आंकड़ों में ही खत्म हो जाएगा, और जब समुदाय जनगणना में दर्ज ही नहीं रहेगा तो उसके लिए कोई नीति, योजना या अधिकार भी नहीं बचेंगे।

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पूर्व शिक्षा मंत्री ने कहा कि वे वर्ष 2020 से लगातार इस मुद्दे को उठा रही हैं, लेकिन कुछ संगठन यह कहकर भ्रम फैला रहे हैं कि “सरना सनातन है, अलग कॉलम की जरूरत नहीं।” उन्होंने आरोप लगाया कि यह सोच आदिवासियों को जबरन हिंदू सामाजिक ढांचे में समाहित करने की रणनीति है।

गीताश्री उरांव ने चेतावनी दी कि आदिवासी कभी भी वर्ण व्यवस्था का हिस्सा नहीं रहे, लेकिन यदि उन्हें हिंदू के रूप में दर्ज किया गया तो वे सामाजिक रूप से सबसे निचले पायदान पर धकेल दिए जाएंगे। इसके साथ ही पांचवीं और छठी अनुसूची, आदिवासी स्वशासन और जल-जंगल-जमीन से जुड़े संवैधानिक प्रावधान भी कमजोर कर दिए जाएंगे।

उन्होंने कहा कि एक ओर ईसाई बने आदिवासियों को एसटी सूची से हटाने की मांग की जा रही है और दूसरी ओर सरना को हिंदू बताने की कोशिश हो रही है। दोनों का उद्देश्य एक ही है—आदिवासियों की अलग पहचान को खत्म करना।

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अंत में गीताश्री उरांव ने सरना धर्मालंबियों और समस्त आदिवासी समाज से अपील की कि यदि वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं तो अब चुप न रहें। उन्होंने कहा कि प्रखंड और जिला स्तर पर सड़कों पर उतरकर इस षड्यंत्र के खिलाफ आंदोलन करना जरूरी है।

उन्होंने कहा, “अब नहीं तो फिर कभी नहीं। अपनी पहचान, मान-सम्मान और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर आवाज उठानी होगी।”

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