धुमकुड़िया 2025: धरोहर से भविष्य तक, धुमकुड़िया के माध्यम से युवा सशक्तिकरण की नई पहल

रांची: आदिवासी समाज की सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सामुदायिक पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए टीम धुमकुड़िया रांची ने आगामी 25 दिसंबर 2024 को एक दिवसीय करियर गाइडेंस कार्यक्रम का आयोजन किया है। कार्यक्रम अरगोड़ा स्थित वीर बुद्धु भगत धुमकुड़िया भवन में किया जाएगा। इस कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को करियर निर्माण में मार्गदर्शन देना, साथ ही अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा देना है।

क्या है धुमकुड़िया
धुमकुड़िया उरांव जनजाति का पारंपरिक शैक्षणिक केंद्र है, जो सांस्कृतिक, धार्मिक, व्यावसायिक और सामुदायिक ज्ञान का केंद्र रहा है। यह संस्थान मौखिक शिक्षा प्रणाली के माध्यम से युवाओं को पारंपरिक ज्ञान और जीवन कौशल सिखाने का माध्यम है। संथालों में गिती-ओड़ा, गोंडों में घोटूल और बोंडा जनजाति में सेल्नेडिंगो जैसे संस्थान इसी परंपरा के समानांतर मौजूद हैं।

हालांकि, आधुनिक स्कूल-कॉलेज की बढ़ती प्रभावशीलता के चलते पारंपरिक शिक्षा केंद्रों, जैसे धुमकुड़िया, पर नकारात्मक असर पड़ा है। अधिकतर गांवों में ये केंद्र या तो विलुप्त हो चुके हैं या नाममात्र के रूप में जर्जर हालत में मौजूद हैं। ज्ञान और रोजगार की तलाश में आदिवासियों का शहरीकरण बढ़ा है, जिसके परिणामस्वरूप उनके सामूहिक जीवन और पारंपरिक ज्ञान-कौशल, जो बुजुर्गों से धरोहर के रूप में मिलता था, लगभग समाप्त हो रहे हैं। इस प्रक्रिया में आदिवासी समाज अपने दर्शन, रीति-रिवाज, संस्कार और सामुदायिकता से दूर होता जा रहा है। युवा आधुनिक शिक्षा तो हासिल कर रहे हैं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक जड़ों से कटते जा रहे हैं।

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आज की आवश्यकता है कि आधुनिक शिक्षा के साथ पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित कर समाज की सामुदायिकता को बनाए रखा जाए। युवाओं की जरूरतों को पूरा करना पारंपरिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है। आदिवासी युवा आधुनिक शिक्षा के माध्यम से न केवल अपना भविष्य संवारें, बल्कि अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को भी आगे बढ़ाएं।

आधुनिकता और धुमकुड़िया का महत्व
आज का समय आदिवासी समाज के लिए एक अहम मोड़ पर खड़ा है। आधुनिक शिक्षा और पारंपरिक ज्ञान को एक साथ जोड़ने की आवश्यकता है। धुमकुड़िया केवल एक शिक्षण केंद्र नहीं है, बल्कि आदिवासी जीवन के टिकाऊ विकास, सामुदायिकता, और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक भी है। यह संस्थान आदिवासी दर्शन को संरक्षित करते हुए युवा पीढ़ी को अपने समाज और संस्कृति से जोड़ने का प्रयास करता है।

लैटिन अमेरिकी विद्वान ग्रिमाल्डो रेंगीफो वास्केज़ के अनुसार, “आदिवासी सोच में जीवंत ज्ञान है, जो न केवल चीजों की प्रकृति को समझने में मदद करता है, बल्कि उसे जीने की प्रेरणा भी देता है।” यह विचार धुमकुड़िया की प्रासंगिकता को स्पष्ट करता है।
इस सोच को आगे बढ़ाने और धुमकुड़िया की परंपरा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से टीम धुमकुड़िया रांची ने हर साल की तरह इस बार भी 25 दिसंबर 2024 को एक दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया है। कार्यक्रम का मुख्य फोकस आदिवासी युवाओं को बेहतर करियर विकल्पों के बारे में जानकारी देना और उन्हें अपने समाज की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए प्रेरित करना है।

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कार्यक्रम के तहत विभिन्न आयु वर्ग के छात्रों को मार्गदर्शन दिया जाएगा कि कैसे वे आधुनिक शिक्षा का उपयोग कर न केवल अपने भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, बल्कि अपने समाज के लिए आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं।


धुमकुड़िया जैसे पारंपरिक संस्थान न केवल आदिवासी समाज की पहचान और गर्व का प्रतीक हैं, बल्कि सतत विकास और सामुदायिकता के माध्यम से एक आदर्श जीवन पद्धति का संदेश भी देते हैं। टीम धुमकुड़िया रांची की यह पहल आदिवासी युवाओं को अपने समाज की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने और उन्हें एक नई दिशा देने में सहायक सिद्ध होगी।

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