नागालैंड में आरक्षण नीति की समीक्षा के लिए आयोग गठित

नागालैंड सरकार ने राज्य की दशकों पुरानी आरक्षण नीति की समीक्षा करने के लिए एक नया आयोग गठित किया है। यह निर्णय पाँच प्रमुख नागा जनजातियों द्वारा दिए गए दस दिन के अल्टीमेटम के बाद लिया गया है। इन जनजातियों का कहना है कि 1977 से लागू यह नीति वर्तमान सामाजिक और शैक्षिक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रह गई है।

आयोग का गठन और उद्देश्य

सोमवार को जारी अधिसूचना के अनुसार, सरकार ने एक आयोग का गठन किया है, जिसका काम सरकारी क्षेत्र में लागू आरक्षण नीति की समीक्षा करना और जनजातीय प्रतिनिधित्व के लिए एक न्यायसंगत ढांचा तैयार करना होगा।
इस आयोग की अध्यक्षता सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी आर. रामकृष्णन करेंगे। आयोग में गृह, कानून और न्याय, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, मानव संसाधन और प्रशासनिक सुधार विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल किए गए हैं।

जनजातियों की मांग और सरकार की प्रतिक्रिया

कोरप (Core Committee on Reservation Policy) नामक समिति ने 20 सितंबर को सरकार को 10 दिन का अल्टीमेटम दिया था। यह समिति आओ (Ao), अंगामी (Angami), लोथा (Lotha), रेंगमा (Rengma) और सुमी (Sumi) जनजातियों का प्रतिनिधित्व करती है।
समिति ने चेतावनी दी थी कि यदि सरकार ने निर्धारित समयसीमा के भीतर समीक्षा आयोग का गठन नहीं किया, तो 1 अक्टूबर से आठ जिलों—कोहिमा, दीमापुर, मोकोकचुंग, वोखा, निउलैंड सहित अन्य—में पूर्ण बंद (बंदहड़ताल) किया जाएगा।

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नीति की पृष्ठभूमि

1977 में लागू इस नीति का उद्देश्य सात जनजातियों को सरकारी नौकरियों में 25 प्रतिशत आरक्षण देना था। बाद में यह बढ़कर 37 प्रतिशत हो गया। वर्तमान में, इसमें 25 प्रतिशत आरक्षण पूर्वी नागालैंड की सात पिछड़ी जनजातियों को और 12 प्रतिशत अन्य चार पिछड़ी जनजातियों को दिया जा रहा है।
कोरप का कहना है कि यह ढांचा अब असमान और पुराना हो चुका है तथा इसे बदलना आवश्यक है ताकि वर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप नीति बनाई जा सके।

आयोग की जिम्मेदारी और आगे की प्रक्रिया

आयोग को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह आरक्षण से जुड़े कानून और नियमों की समीक्षा करे, विभिन्न समुदायों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का आकलन करे और सभी पक्षों से राय-मशविरा करके अपनी रिपोर्ट तैयार करे।
सरकार ने आयोग को छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है।

पाँचों जनजातियाँ अप्रैल से इस मांग को लेकर आंदोलनरत थीं। सरकार द्वारा आयोग गठित करने के बाद अब निगाहें इस बात पर हैं कि आयोग क्या सिफारिशें करता है और उस पर सरकार का अगला कदम क्या होगा।

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