गुजरात के गांधीनगर जिले के कलोल की सेशंस कोर्ट ने गोहत्या के एक मामले में तीन दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है. अदालत ने अपने 76 पन्नों के फैसले में मनुस्मृति और ऋग्वेद का हवाला देते हुए गाय के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि यदि गायों की बेरहमी से हत्या करने वालों को कानून के मुताबिक सजा नहीं दी गई, तो धीरे-धीरे ‘गौ माता पृथ्वी से विलुप्त हो जाएगी’.
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बृजेशकुमारी रमेश्वरसिंह राजपूत ने वसीम, मोहम्मद रफीक और अशफाक उर्फ सलमान को गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, 1954 की धारा 8(2) के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई. प्रत्येक दोषी पर दो लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया. अदालत ने स्पष्ट किया कि फैसला मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया गया है.
दरअसल, मामला 22 अगस्त 2024 की है, जब गांधीनगर जिले के कलोल तालुका स्थित एक मकान में छापेमारी की गई थी. आरोप था कि वहां आर्थिक लाभ के लिए गोवंश का अवैध वध किया जा रहा था और मांस बिक्री के लिए तैयार रखा गया था.
छापेमारी के दौरान करीब 277 किलो मांस बरामद हुआ, जिसकी कीमत 55,400 रुपये बताई गई. मौके से चाकू, कुल्हाड़ी, तराजू, रस्सियां और वाहन भी जब्त किए गए. जब्त सामान की कुल कीमत 3,61,540 रुपये आंकी गई.
अदालत के फैसले के अनुसार, घटनास्थल से गोवंश के सिर, पैर, खाल और अन्य अवशेष भी मिले थे. अदालत ने इसे पशु चिकित्सक की गवाही, छापेमारी करने वाली टीम के सदस्यों के बयान, स्वतंत्र गवाहों की गवाही और फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट के साथ महत्वपूर्ण साक्ष्य माना.
मनुस्मृति और ऋग्वेद का दिया हवाला
सजा पर विचार करते हुए अदालत ने गाय के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का उल्लेख किया. मनुस्मृति का हवाला देते हुए फैसले में गाय और गोवंश को समाज तथा धर्म के महत्वपूर्ण आधार के रूप में प्रस्तुत किया गया.
अदालत ने ऋग्वेद का उल्लेख करते हुए गाय के लिए ‘अधन्या’ शब्द का भी जिक्र किया, जिसका अर्थ न मारे जाने योग्य बताया गया है. फैसले में यह संस्कृत श्लोक भी उद्धृत किया गया.
‘त्वं माता सर्वदेवानां त्वं च यज्ञस्य कारणम्। त्वं तीर्थं सर्वतीर्थानां नमस्तेऽस्तु सदानघे॥’
इस श्लोक में गाय को सभी देवताओं की माता और यज्ञ का आधार बताते हुए उसके प्रति सम्मान व्यक्त किया गया है. अदालत ने गायों के शरीर के अंगों को बेरहमी से काटकर अलग करने की बात का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में कानून के तहत सजा देना आवश्यक है.
बचाव पक्ष ने दलील दी कि मांस की पहचान की पुष्टि करने वाली FSL रिपोर्ट आने से पहले ही शिकायत दर्ज कर दी गई थी. आरोपियों ने जब्त औजारों और वाहनों की जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए.
हालांकि, अदालत ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों को विश्वसनीय माना. मांस की बरामदगी, घटनास्थल से मिले अवशेष और FSL रिपोर्ट को भी अहम आधार बनाया. अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि तीनों दोषियों के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित हुए हैं.
उम्रकैद के साथ 10 साल की अतिरिक्त सजा
दोषियों के वकील ने परिवीक्षा (प्रोबेशन) का लाभ देने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया. अदालत के मुताबिक, अपराध की प्रकृति और निर्धारित सजा को देखते हुए दोषियों को यह लाभ नहीं दिया जा सकता.
तीनों दोषियों को गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, 1954 की धारा 8(2) के तहत उम्रकैद और दो-दो लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई. इसके अतिरिक्त, धारा 8(4) के तहत धारा 6(क) और 6(ख) से संबंधित अपराध में प्रत्येक को 10 साल के कठोर कारावास और एक-एक लाख रुपये जुर्माने की सजा दी गई. अदालत ने आदेश दिया कि दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी.
मामले में दो अन्य आरोपी गुलाम मोइन मुस्ताक अहमद कुरैशी और विट्ठल उर्फ भूपत सेनमा को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया. अदालत के मुताबिक, घटनास्थल पर विट्ठल की मौजूदगी और पांचवें आरोपी को कथित तौर पर मांस बेचे जाने के आरोप की पुष्टि के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं थे.
एक अन्य आरोपी लालाभाई मणिलाल सेनमा की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो गई थी. अदालत ने फैसले में टिप्पणी की कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उसके खिलाफ भी आरोप साबित हो जाते, यदि वह जीवित होता.





