हिमालय में ग्लेशियर के ढहने से 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल के साथ चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी भारी तबाही मचाई है. लेकिन एक ही आपदा के बाद दोनों तरफ की तस्वीर बिल्कुल अलग है. नेपाल में मौतों, लापता लोगों और तबाह हुए गांवों की जानकारी लगातार सामने आ रही है, जबकि सीमा के उस पार तिब्बत में तबाही की वास्तविक तस्वीर अब भी स्पष्ट नहीं हो सकी है.
नेपाल में अब तक 903 लोगों की मौत और 4,247 लोगों के लापता होने की पुष्टि हुई है. वहीं चीन के तिब्बत क्षेत्र में आधिकारिक तौर पर 16 लोगों की मौत और 546 लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई है. लापता लोगों में 23 देशों के 261 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं. यानी आपदा दोनों देशों में आई, लेकिन तिब्बत में नुकसान कितना व्यापक है, इसका स्वतंत्र आकलन करना मुश्किल बना हुआ है.
नेपाल में रिपोर्टर पहुंचे, तिब्बत में सरकारी जानकारी पर निर्भर दुनिया
नेपाल में स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्रभावित इलाकों तक पहुंचकर पीड़ितों, बचावकर्मियों और अधिकारियों से जानकारी जुटा रहे हैं. इसके विपरीत तिब्बत के प्रभावित क्षेत्र में विदेशी पत्रकारों की स्वतंत्र पहुंच नहीं है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया को वहां की स्थिति के लिए मुख्य रूप से चीनी सरकार और सरकारी मीडिया की ओर से जारी जानकारी पर निर्भर रहना पड़ रहा है.
ब्रिटेन के अखबार द गार्जियन ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि तिब्बत में सूचना के सख्त नियंत्रण के कारण आपदा के वास्तविक पैमाने का स्वतंत्र आकलन मुश्किल हो रहा है. सरकारी मीडिया ने राहत और बचाव कार्यों की जानकारी दी है, लेकिन प्रभावित लोगों और नुकसान की व्यापक तस्वीर सीमित रूप से सामने आई है.
आखिर तिब्बत तक कैसे पहुंची तबाही?
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, नेपाल में लांगटांग लिरुंग पर्वत पर करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर टूटने के बाद बर्फ और चट्टानों का विशाल हिमस्खलन हुआ. यह मलबा तेजी से नीचे आया और एक बड़े डेब्रिस फ्लो का रूप लेते हुए करीब 22 किलोमीटर तक बहकर चीन-नेपाल सीमा पर स्थित ग्यिरोंग पोर्ट तक पहुंच गया.
यानी आपदा की शुरुआत नेपाल की ऊंची हिमालयी चोटियों से हुई, लेकिन बर्फ, चट्टान और मलबे की विनाशकारी धारा ने सीमा पार कर तिब्बत के इलाके को भी अपनी चपेट में ले लिया.
राहत कार्य जारी, लेकिन सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं
चीनी सरकार ने राहत और बचाव अभियान की व्यापक जानकारी जारी की है. उसके अनुसार 2,141 से अधिक बचावकर्मी और बड़ी संख्या में वाहन व उपकरण प्रभावित क्षेत्र में लगाए गए हैं. मलबे से बनी बैरियर लेक का पानी भी काफी हद तक निकल जाने की बात कही गई है.
लेकिन सवाल केवल राहत अभियान का नहीं है. सवाल यह है कि जिस आपदा ने नेपाल में सैकड़ों लोगों की जान ली और हजारों को लापता कर दिया, उसी बाढ़ से प्रभावित तिब्बत में वास्तविक मानवीय और आर्थिक नुकसान की पूरी तस्वीर दुनिया के सामने कब आएगी?
आपदा से पहले भी नेपाल ने मांगी थी ज्यादा जानकारी
इस त्रासदी ने नेपाल और चीन के बीच सीमा पार आपदा चेतावनी प्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, आपदा से करीब तीन महीने पहले दोनों देशों के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने ग्लेशियर, बाढ़ और अन्य खतरों की निगरानी पर चर्चा की थी. नेपाल ने चीन से अधिक विस्तृत और रियल टाइम जानकारी साझा करने की जरूरत बताई थी, खासकर हिमस्खलन, जलस्तर और अन्य अचानक आने वाले खतरों को लेकर.





