भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में झारखंड की धरती ने सबसे पहले विद्रोह का बिगुल फूंका। चाहे 1855 का ऐतिहासिक संताल हूल हो या उससे पहले तिलका मांझी का सशस्त्र संघर्ष—अंग्रेजी सत्ता को सबसे पहली और सबसे सशक्त चुनौती इसी भूमि से मिली। 1857 की क्रांति की पहली चिंगारी भी देवघर के पास रोहिणी से उठी, जिसने आगे चलकर पूरे देश को अपने आगोश में ले लिया। इस राष्ट्रव्यापी विद्रोह की ज्वाला ने छोटानागपुर, विशेषकर रांची क्षेत्र, को भी झकझोर कर रख दिया।
■ शेख भिखारी: एक साधारण बुनकर से क्रांतिकारी सेनानायक तक
1857 के इस महासंग्राम में शेख भिखारी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उनका जन्म 1831 में रांची जिले के होक्टे गांव में एक साधारण बुनकर परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे अपने पारिवारिक पेशे—मोटे कपड़े बनाकर हाट-बाजार में बेचने—से परिवार का सहयोग करते थे।
लगभग 20 वर्ष की आयु में उन्होंने छोटानागपुर के महाराज के यहां नौकरी शुरू की, जहां अपनी प्रतिभा, सूझबूझ और नेतृत्व क्षमता के कारण वे शीघ्र ही दरबार में एक सम्मानजनक स्थान प्राप्त करने में सफल रहे।
बाद में बड़कागढ़–जगन्नाथपुर के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने शेख भिखारी को अपने राज्य में दीवान नियुक्त किया और बड़कागढ़ की सैन्य व्यवस्था का पूरा दायित्व उन्हें सौंपा। इस फौज में बड़ी संख्या में मुस्लिम और आदिवासी नौजवान शामिल थे—जो उस समय साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक साझा प्रतिरोध का प्रतीक थे।
■ अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित विद्रोह की तैयारी
1856–57 के दौरान जब अंग्रेजों ने देशी रियासतों को कुचलने की योजना बनानी शुरू की, तो इसकी भनक राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को लग गई। उन्होंने अपने विश्वासपात्र साथियों—वजीर पांडेय गणपतराय, दीवान शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह—के साथ गहन विचार-विमर्श किया।
इन सभी ने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का निर्णय लिया और जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह से संपर्क स्थापित किया।
इसी दौरान शेख भिखारी ने रांची और चाईबासा के नौजवानों को बड़कागढ़ की सेना में भर्ती करना शुरू कर दिया। 1857 में जब अंग्रेजों ने अचानक सैन्य कार्रवाई शुरू की, तो विरोध में रामगढ़ की हिंदुस्तानी रेजिमेंट ने अपने अंग्रेज अफसर को मार डाला। हवलदार नादिर अली और सिपाही रामविजय रेजिमेंट छोड़कर शेख भिखारी की सेना में शामिल हो गए।
इस प्रकार छोटानागपुर में आज़ादी की आग भड़क उठी।
■ छोटानागपुर में अंग्रेजी सत्ता का पतन
रांची, चाईबासा और संताल परगना के कई इलाकों से अंग्रेज अफसर भाग खड़े हुए। चाईबासा के अंसारी नौजवान अमानत अली, सलामत अली और शेख हारू—तीनों सगे भाइयों—ने दुमका के अंग्रेज एसडीओ को मार गिराया। इससे अंग्रेजी प्रशासन में जबरदस्त दहशत फैल गई और पूरा क्षेत्र लगभग अंग्रेज अधिकारियों से खाली हो गया।
इस सफलता से उत्साहित होकर ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने रांची के डोरंडा में विजय उत्सव मनाया। लेकिन यह खुशी अल्पकालिक सिद्ध हुई।
■ चुट्टूपालू की ऐतिहासिक लड़ाई
अंग्रेजों ने जल्द ही जनरल मैकडोना के नेतृत्व में एक बड़ी सेना रामगढ़ भेजी और चुट्टूपालू घाटी के पहाड़ी रास्ते से रांची पर चढ़ाई की कोशिश की।
इस हमले को रोकने के लिए शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह अपनी सेना के साथ चुट्टूपालू पहाड़ी पर डट गए। शेख भिखारी ने घाटी के पुल को तुड़वा दिया, रास्तों के पेड़ कटवाकर मार्ग अवरुद्ध कर दिया और अंग्रेजी सेना पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी।
कई दिनों तक चले इस संघर्ष में अंग्रेजी सेना के छक्के छूट गए। जब शेख भिखारी के पास गोलियां समाप्त होने लगीं, तो उन्होंने अपनी सेना को पहाड़ से बड़े-बड़े पत्थर लुढ़काने का आदेश दिया, जिससे अंग्रेज सैनिक भारी संख्या में हताहत हुए।
■ विश्वासघात और गिरफ्तारी
स्थिति बिगड़ती देख जनरल मैकडोना ने कुछ स्थानीय लोगों की मदद से चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ने का एक गुप्त रास्ता खोज निकाला। उसी रास्ते से अंग्रेजी सेना पीछे से पहाड़ी पर चढ़ गई। इसकी जानकारी शेख भिखारी को नहीं मिल सकी।
परिणामस्वरूप 6 जनवरी 1858 को शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह को घेरकर गिरफ्तार कर लिया गया।
■ 8 जनवरी 1858: इतिहास का काला दिन
7 जनवरी 1858 को चुट्टूघाटी में एक तथाकथित फौजी अदालत लगाई गई, जहां बिना किसी विधिवत मुकदमे के जनरल मैकडोना ने शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह को फांसी की सजा सुना दी।
अगले ही दिन, 8 जनवरी 1858, दोनों वीरों को चुट्टूपहाड़ी के बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गई।
यह वही बरगद का पेड़ है, जो आज भी वहां खड़ा है—उनके बलिदान का मौन साक्षी बनकर। हर वर्ष यहां बलिदान दिवस के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह का बलिदान केवल झारखंड या छोटानागपुर की नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की साझा विरासत है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि आज़ादी की लड़ाई किसी एक धर्म, जाति या समुदाय की नहीं, बल्कि शोषण के विरुद्ध पूरे समाज की सामूहिक चेतना का परिणाम थी।
उनकी शहादत हमें आज भी याद दिलाती है कि स्वतंत्रता हमें विरासत में नहीं मिली—यह अनगिनत बलिदानों की कीमत पर अर्जित हुई है।





