मुड़मा जतरा: उरांव समाज के इतिहास और संस्कृति का जीवंत उत्सव

झारखंड की पहचान उसकी विविध जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ी है। इन्हीं परंपराओं में एक प्रमुख स्थान रखता है मुड़मा जतरा, जो न केवल उरांव समाज का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आयोजन है बल्कि झारखंड के ऐतिहासिक मेलों में भी अग्रणी है। रांची से लगभग 25 किलोमीटर दूर, रांची-लोहरदगा मार्ग पर स्थित मुड़मा गांव इस वार्षिक आयोजन का केंद्र है।

उरांवों का छोटानागपुर में आगमन

इतिहासकारों और लोककथाओं के अनुसार, उरांव जनजाति दक्षिण भारत और रोहतास क्षेत्र से होते हुए छोटानागपुर आई। यहां उनका सामना स्थानीय मुंडा जनजाति से हुआ। शुरुआती संघर्षों के बाद दोनों समुदायों के बीच समझौता हुआ। इस समझौते ने उरांवों को बसने की अनुमति दी और दोनों समुदायों के बीच भाईचारे का रिश्ता कायम हुआ।

इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में उरांव समुदाय ने एक उत्सव मनाना शुरू किया, जो समय के साथ मुड़मा जतरा के रूप में विकसित हुआ। आज भी उरांव समाज मुंडाओं को “बड़े भाई” का दर्जा देता है।

See also  ओडिशा में आदिवासी ईसाइयों पर घर वापसी का दबाव: फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट

विजय दिवस से जतरा तक

मुड़मा जतरा का मूल स्वरूप विजयोत्सव है। परंपरागत नगाड़ों की गूंज, वीर रस से भरे गीत, नृत्य और पड़हा राजा का स्वागत इस बात की याद दिलाते हैं कि यह उत्सव उरांव समाज के संघर्ष और जीत की कहानी से जुड़ा है।

समय के साथ यह आयोजन केवल विजय स्मृति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महोत्सव के रूप में स्थापित हो गया।

जतरा खूंटा और पड़हा व्यवस्था

मुड़मा जतरा का केंद्र बिंदु है जतरा खूंटा, जिसे शक्ति और एकता का प्रतीक माना जाता है।

यह आयोजन मुख्य रूप से चालीस पड़हा गांवों की भागीदारी से होता है।

पड़हा उरांव समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था है, जो सामूहिक निर्णय और सामाजिक अनुशासन का प्रतीक है।

इस मौके पर हर पड़हा गांव अपनी विशेष पहचान, झंडे, वाद्ययंत्र और पारंपरिक पोशाकों के साथ जतरा स्थल में प्रवेश करता है।

विशेष रूप से पुनगी पड़हा गांव को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है, क्योंकि जतरा खूंटा बदलने का अधिकार इन्हीं के पास है।

See also  रांची में डीलिस्टिंग के समर्थन में निशा भगत ने कराया सिर मुंडन

सांस्कृतिक और सामाजिक आयाम

मुड़मा जतरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक मंच भी है।

यहां उरांवों के पारंपरिक नृत्य-गान, लोकगीत और उत्सव पूरे जोश के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं।

यह परिवारों के मिलन और रिश्ते-नातों के जुड़ने का अवसर भी है। वर-वधू की तलाश से लेकर पारिवारिक मुलाकातें तक, सब इसी जतरा के दौरान होती हैं।

धीरे-धीरे इसमें अन्य समुदाय जैसे सदान (गैर-उरांव) भी शामिल होने लगे, जिससे यह उत्सव साझा सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन गया।

आधुनिक स्वरूप

आज मुड़मा जतरा एक भव्य मेला भी बन चुका है।

इसमें दुकानों, व्यापारियों और मनोरंजन कार्यक्रमों की भरमार होती है।

प्रशासन और सामाजिक संस्थाएं मिलकर आयोजन को सुव्यवस्थित करती हैं।

आधुनिकता और महंगाई के बावजूद आदिवासी संगठनों के प्रयासों से इसकी लोकप्रियता अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी है। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों से भी उरांव समाज के लोग इस जतरा में शामिल होने आते हैं।

See also  आदिवासियों का धर्मांतरणः इंदिरा, मोदी, RSS, ईसाई मिशनरियों का रुख और डिलिस्टिंग की मांग का क्या है कनेक्शन?

मुड़मा जतरा उरांव समाज की संस्कृति, इतिहास और सामूहिक पहचान का जीवंत प्रतीक है।
यह न केवल उनके अस्तित्व संघर्ष और विजय की याद दिलाता है, बल्कि भाईचारे, परंपरा और सामुदायिक एकता का भी उत्सव है।

यदि आप झारखंड की जनजातीय संस्कृति को नजदीक से अनुभव करना चाहते हैं, तो जीवन में एक बार अवश्य मुड़मा जतरा में सम्मिलित हों।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

10 most Expensive cities in the World धरती आबा बिरसा मुंडा के कथन