डीलिस्टिंग प्रदर्शन पर झारखंड की पूर्व शिक्षा मंत्री का बयान, निशा भगत के विरोध को बताया ‘राजनीतिक एजेंडा’

रांची: डीलिस्टिंग की मांग को लेकर रांची में हुए प्रदर्शन और सामाजिक कार्यकर्ता निशा भगत द्वारा कराए गए सिर मुंडन पर झारखंड की पूर्व शिक्षा मंत्री गीताश्री उरांव ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को आदिवासी समाज के हितों के विरुद्ध बताते हुए कई गंभीर आरोप लगाए हैं।

पूर्व शिक्षा मंत्री ने कहा कि निशा भगत और उनसे जुड़े संगठन यह स्पष्ट क्यों नहीं करते कि 1961 से लागू जनगणना के कॉलम कोड को किसके दबाव में बदला गया। उनके अनुसार, विश्व हिंदू परिषद द्वारा ‘सरना–सनातनी एक हैं’ और आरएसएस द्वारा ‘आदिवासी हिंदू ही हैं, अलग कॉलम कोड की जरूरत नहीं’ जैसे तर्कों के आधार पर 2020–21 की प्रस्तावित जनगणना के कार्य-प्रपत्र से ‘आदिवासी धर्म एवं मान्यताएं’ वाला कॉलम हटा दिया गया।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज ने जल, जंगल और जमीन से जुड़ी अपनी सदियों पुरानी परंपराओं और संस्कृति की रक्षा के लिए ऐतिहासिक बलिदान दिए, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय संविधान में अनुच्छेद 13(3)(क), अनुच्छेद 244(1) के तहत पांचवीं अनुसूची तथा अनुच्छेद 244(2) के अंतर्गत छठी अनुसूची जैसे प्रावधान शामिल किए गए। उनका आरोप है कि इन सबके बावजूद गैर-धर्मांतरित सरना आदिवासियों को ही पहले डीलिस्ट कर दिया गया, जिससे उनकी पहचान और संवैधानिक अधिकार प्रभावित हुए।

See also  जयशंकर ने बांग्लादेश की स्थिति पर संसद को जानकारी दी, कहा- हम ढाका के साथ लगातार संपर्क में

पूर्व शिक्षा मंत्री ने कहा कि जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा वर्ष 2023 में पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों में “ईसाइयों को डीलिस्ट करो” अभियान चलाया गया, लेकिन यह नहीं बताया गया कि सरना आदिवासियों को 2020–21 से पहले ही डीलिस्ट किया जा चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे “आदिवासियों के सरकारी धर्मांतरण का रास्ता खोल दिया गया।”

अपने बयान में उन्होंने यह भी कहा कि यह पूरा अभियान विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और भाजपा के वर्ष 1994 में बने कथित संयुक्त एजेंडे—“आदिवासियत को खत्म करना” और “संपूर्ण राष्ट्र बनाना”—से जुड़ा हुआ है।

पूर्व शिक्षा मंत्री ने निशा भगत के पुराने बयानों का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने पहले सरना कोड की मांग को नकारते हुए आदिवासियों को हिंदू बताया था, और यह भी आरोप लगाया कि निशा भगत पूर्व में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ी रही हैं तथा वर्तमान में जनजाति सुरक्षा मंच के विचारों को आगे बढ़ा रही हैं।

See also  रांची में पहला “धरती आबा ट्राइबल फिल्म फेस्टिवल” 2025: आदिवासी जीवन, संस्कृति और सिनेमा का उत्सव

उन्होंने आरोप लगाया कि यह गतिविधियां आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों को देखते हुए राजनीतिक लाभ के लिए की जा रही हैं। उनके अनुसार, “यह मुंडन समाज को बचाने के लिए नहीं, बल्कि समाज को ‘मुंडने’ के लिए किया गया है।”

बयान के अंत में पूर्व शिक्षा मंत्री ने आदिवासी समाज से सतर्क रहने की अपील करते हुए कहा कि ऐसे आंदोलनों से आदिवासी पहचान और अस्तित्व पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

इस पूरे मामले पर निशा भगत, केंद्रीय सरना समिति या संबंधित संगठनों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

10 most Expensive cities in the World धरती आबा बिरसा मुंडा के कथन