एत्वा उराँव (फादर जे. बखला) : आदिवासी शिक्षा और भाषा आंदोलन के अग्रदूत

जन्म: 12 अगस्त 1951
देहांत: 9 जुलाई 2025

झारखंड की भूमि ने कई महान सपूतों को जन्म दिया है जिन्होंने न केवल अपने समुदाय के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का कार्य किया है। इन्हीं में एक नाम है एत्वा उराँव, जिन्हें फादर जे. बखला (Fr. J. Baxla) के नाम से भी जाना जाता है। वे न केवल एक धर्मगुरु थे, बल्कि आदिवासी पहचान, शिक्षा, और भाषा के संघर्ष के सशक्त योद्धा भी थे।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

एत्वा उराँव का जन्म 12 अगस्त 1951 को झारखंड के गुमला ज़िले में हुआ था। उनका बचपन एक आदिवासी गाँव में बीता जहाँ सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षा के प्रति उनका झुकाव बचपन से ही स्पष्ट था। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने मिशन स्कूलों से पढ़ाई की और बाद में सेल्सियन मिशनरी संगठन (Salesians of Don Bosco – SDB) से जुड़ गए।

पादरी जीवन और समाज सेवा

फादर जे. बखला ने पादरी बनने के बाद अपने जीवन को पूरी तरह से समाज सेवा को समर्पित कर दिया। विशेष रूप से उराँव आदिवासी समुदाय के बच्चों के लिए उन्होंने शिक्षा, आत्मबल और सांस्कृतिक चेतना की अलख जगाई।

See also  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दिए बीते 10 वर्षों के विवादित आदिवासी भूमि सौदों की जांच के आदेश

‘लूर्दिप्पा’ की स्थापना

साल 2000 में फादर बक्सला ने ‘लूरडीपा’ (Loordippa) नामक एक अनूठे स्कूल की स्थापना की, जो झारखंड के चैंपुर (Chainpur) से लगभग 35 किमी दूर स्थित है। इस स्कूल की विशेषता थी कि यहाँ कुड़ुख (उराँवों की मातृभाषा) और अंग्रेज़ी को माध्यम बनाकर शिक्षा दी जाती थी। यह झारखंड का पहला कुड़ुख-अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल था।

लूरडीपा का उद्देश्य केवल शिक्षा देना नहीं था, बल्कि भाषा, संस्कृति और आदिवासी अस्मिता को पुनर्जीवित करना था। यहाँ के बच्चे न केवल अकादमिक शिक्षा लेते हैं बल्कि अपनी जड़ों से भी जुड़े रहते हैं। विद्यालय में करीब 600 छात्र अध्ययनरत हैं, जिनमें से लगभग 350 छात्र हॉस्टल में रहते हैं।

आदिवासी भाषाओं के प्रति समर्पण

फादर बखला ने यह महसूस किया कि मातृभाषा के बिना आत्म-सम्मान अधूरा है। उन्होंने कुड़ुख भाषा को संरक्षित करने और उसे शिक्षा के माध्यम में लाने के लिए अथक प्रयास किया। उनके इस प्रयास से न केवल उराँव समुदाय को अपनी भाषा में पढ़ने का अधिकार मिला, बल्कि अन्य आदिवासी भाषाओं के लिए भी एक मिसाल कायम हुई।

See also  Indigenous Beliefs in Arabia Before Islam: Gods, Goddesses, and Traditions

एक दूरदर्शी नेता

फादर बखला का विज़न केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था। वे मानते थे कि एक आदिवासी तब तक पूर्ण रूप से सशक्त नहीं हो सकता जब तक वह अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास को नहीं जानता। वे सामुदायिक नेतृत्व, लोकसंस्कृति, और आत्मनिर्भरता की बातें करते थे।

मृत्यु और विरासत

9 जुलाई 2025 को एत्वा उराँव (फादर जे. बखला) ने इस दुनिया को अलविदा कहा। उनकी मृत्यु से केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि समूचे भारत के आदिवासी आंदोलन ने एक मजबूत आवाज़ खो दी। परंतु उनकी विरासत ‘लूर्दिप्पा’ जैसे स्कूलों, हजारों छात्रों और उनके विचारों में जीवित रहेगी।

निष्कर्ष

एत्वा उराँव का जीवन एक आदिवासी बालक से लेकर एक अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण रखने वाले शिक्षाविद् और सांस्कृतिक योद्धा बनने तक का सफर है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि यदि संकल्प हो, तो कोई भी भाषा, कोई भी संस्कृति, और कोई भी समुदाय विश्वपटल पर पहचान बना सकता है।

वे हम सबके लिए प्रेरणा हैं — एक ऐसे समाज के निर्माण की जो अपनी जड़ों से जुड़ा हो, परंतु भविष्य की ओर अग्रसर हो।

See also  झारखंड में आदिवासियों की सरकारी नौकरियों में भागीदारी: चौंकाने वाले आंकड़े

लेखक: विजय उराँव
स्रोत: व्यक्तिगत अनुभव, ब्लॉग, और क्षेत्रीय संवाद
वेबसाइट: www.firstpeople.in

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

10 most Expensive cities in the World धरती आबा बिरसा मुंडा के कथन