When Was Jesus Born? The Surprising Diversity of Christmas Dates Across Christian Belief

For nearly two millennia, Christians worldwide have celebrated the birth of Jesus Christ. Yet behind the seemingly universal tradition of Christmas lies a surprising reality: there is no agreement—historically, theologically, or calendrically—on when this birth actually occurred. The nativity story, central to Christian faith, remains curiously detached from a specific date in historical records. This…

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DONYI–POLO : इतिहास, दर्शन और आधुनिक पुनर्जागरण का पूर्ण अध्ययन

अरुणाचल प्रदेश की स्वदेशी आस्थाओं में Donyi-Polo सबसे प्रमुख, जीवंत और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण विश्वास प्रणाली है।यह एक संगठित धर्म नहीं, बल्कि प्रकृति-आधारित जीवनदर्शन, नैतिक व्यवस्था, और पुरखा-सम्मान का मार्ग है। डोनी का अर्थ—सूर्यपोलो का अर्थ—चंद्रमा सूर्य और चंद्रमा, दोनों मिलकर मानव-जीवन में प्रकाश, सत्य, संतुलन और नैतिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। डीपी (Donyi-Polo)…

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लुगुबुरु घांटाबाड़ी धोरोम गाढ़: संताल समाज की आत्मा का पर्वत

झारखंड की धरती केवल कोयले और जंगलों की नहीं, बल्कि असंख्य जीवंत परंपराओं, आस्थाओं और सांस्कृतिक चेतना की धरती है। इन्हीं पहाड़ियों और वनों के बीच बसा है — लुगुबुरु घांटाबाड़ी धोरोम गाढ़, जो संताल समाज के लिए धर्म, संस्कृति और पहचान का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है।यह केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि आदिवासी…

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विश्वकर्मा पूजा : श्रम, सृजन और समृद्धि का पर्व

भारत विविध परंपराओं और त्योहारों की भूमि है। इन्हीं त्योहारों में से एक है विश्वकर्मा पूजा, जिसे सृजन, निर्माण और श्रम की आराधना का पर्व माना जाता है। भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का प्रथम शिल्पकार, वास्तुकार और तकनीकी ज्ञान का जनक कहा जाता है। यही कारण है कि यह दिन विशेष रूप से श्रमिकों, तकनीशियनों,…

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होलिका दहन: पौराणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व

होलिका दहन भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है, जिसे होली के एक दिन पहले फाल्गुन पूर्णिमा की रात को मनाया जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और सामाजिक सौहार्द, आध्यात्मिकता, तथा सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा होलिका दहन की सबसे प्रचलित कथा भक्त प्रह्लाद और…

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10 most Expensive cities in the World धरती आबा बिरसा मुंडा के कथन