11 नवंबर 1908 : बिरसा के “उलगुलान” से जन्मा छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act)

धरती, अधिकार और अस्तित्व की न्यायपूर्ण कहानी

प्रस्तावना : जब विद्रोह ने कानून को जन्म दिया

11 नवंबर 1908—भारतीय औपनिवेशिक इतिहास की वह तारीख जब ब्रिटिश हुकूमत को आदिवासी प्रतिरोध की आग ने एक ऐसा कानून बनाने पर विवश कर दिया, जिसने आगे चलकर झारखंड की पहचान तय की।
यह था छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 (Chotanagpur Tenancy Act, 1908) — जो केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि धरती आबा बिरसा मुंडा के “उलगुलान” (महान आंदोलन) की गूंज का परिणाम था।

बिरसा का यह उलगुलान केवल सत्ता के विरुद्ध विद्रोह नहीं था, बल्कि भूमि, अस्मिता और आत्मनिर्णय की चेतना का उद्घोष था। इसी चेतना ने अंग्रेजों को यह स्वीकार करने पर मजबूर किया कि छोटानागपुर की मिट्टी कोई “जायदाद” नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति का हिस्सा है।

सामुदायिक भूमि व्यवस्था से औपनिवेशिक शोषण तक

ब्रिटिश शासन से पहले छोटानागपुर की भूमि व्यवस्था पूरी तरह सामुदायिक थी।

मुंडा समाज में खुंटकटी प्रणाली

उरांव समाज में भुइँहारी व्यवस्था

इन व्यवस्थाओं में भूमि समुदाय की होती थी और हर परिवार उसका उपयोग करता था, बिक्री या निजी स्वामित्व की कोई अवधारणा नहीं थी।

1793 के Permanent Settlement (स्थायी बंदोबस्त) के बाद अंग्रेजों ने जमींदारी प्रथा थोप दी।
इससे आदिवासी अपनी ही जमीन पर “किरायेदार” (tenant) बन गए।
गैर-आदिवासी महाजन, ठेकेदार और साहूकार — जिन्हें स्थानीय लोग “दिकु” कहते थे — भूमि हथियाने लगे।
कर्ज़, बेदखली और बेगार ने आदिवासियों को आर्थिक दासता में जकड़ लिया।

विद्रोहों की श्रृंखला : जब धरती ने आवाज उठाई

छोटानागपुर में भूमि हरण के खिलाफ कई विद्रोह फूटे —

कोल विद्रोह (1831–32) : जमींदारी और महाजनी शोषण के खिलाफ।

संथाल हूल (1855–56) : महाजनों और अंग्रेजी राज की मिलीभगत के विरोध में।

मुंडा उलगुलान (1899–1900) : जिसने इस संघर्ष को निर्णायक मोड़ दिया।

बिरसा मुंडा : धरती के पुनर्जागरण का प्रतीक

1875 में उलिहातु गाँव में जन्मे बिरसा मुंडा केवल धार्मिक नेता नहीं थे —
वे समाज सुधारक, राजनीतिक चेतक और आत्मनिर्णय के प्रवक्ता थे।

See also  छत्तीसगढ़ होगा 7वां राज्य, जहाँ का मुख्यमंत्री होगा आदिवासी और छत्तीसगढ़ का पहला

उनका नारा था —

“अबुआ डिसुम, अबुआ राज” — हमारा देश, हमारा राज।

उन्होंने मुंडा, उरांव और हो समुदायों को एक साझा लक्ष्य पर एकजुट किया —
अपनी भूमि वापस पाने का अधिकार।

बिरसा ने धार्मिक सुधार, सामाजिक एकता और राजनीतिक प्रतिरोध—तीनों मोर्चों पर काम किया।
उनका उद्देश्य स्पष्ट था — धरती हमारी माँ है, उसे बेचा नहीं जा सकता।

उलगुलान (1899–1900): भूमि स्वराज का जनआंदोलन

बिरसा के नेतृत्व में हजारों आदिवासी अपने पारंपरिक गांवों की भूमि पर कब्जा पुनः प्राप्त करने उठ खड़े हुए।
अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कठोर दमन से दबाया, बिरसा को गिरफ्तार कर रांची जेल में डाल दिया गया।
9 जून 1900 को उनकी मृत्यु हुई, लेकिन उनके विचार ने ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला दी।

बिरसा की मृत्यु के बाद अंग्रेजी शासन को यह स्वीकार करना पड़ा कि —
भूमि का प्रश्न केवल प्रशासनिक नहीं, सांस्कृतिक और अस्तित्वगत है।

कैंपबेल आयोग (1903) : उलगुलान का राजनीतिक परिणाम

1903 में ब्रिटिश सरकार ने A.F. Campbell आयोग गठित किया।
आयोग ने माना कि —

आदिवासियों की भूमि पर बाहरी लोगों ने कब्जा कर लिया है।

ब्रिटिश कानूनों ने पारंपरिक स्वामित्व प्रणाली को नष्ट किया है।

इसी अन्याय ने बार-बार विद्रोहों को जन्म दिया।

आयोग की सिफारिश थी कि —

  1. आदिवासी भूमि पर बाहरी कब्ज़ा रोका जाए।
  2. पारंपरिक अधिकारों को कानूनी मान्यता दी जाए।
  3. भूमि हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाया जाए।

✦ फादर जॉन बैप्टिस्ट होफमैन : CNT Act के बौद्धिक निर्माता

जर्मन जेसुइट मिशनरी फादर जॉन बैप्टिस्ट होफमैन (1857–1928) ने मुंडा समाज का गहन अध्ययन किया।
उन्होंने देखा कि अंग्रेजी कानूनों ने “खुंटकटी” जैसी सामुदायिक भूमि प्रणाली को खत्म कर दिया था।

See also  Tribal Leadership in Modern India: From the Margins to the Mainstream

होफमैन का योगदान:

  1. उन्होंने “Khuntkatti System” की व्याख्या करते हुए सिद्ध किया कि भूमि समुदाय की है, व्यक्तिगत संपत्ति नहीं।
  2. कैंपबेल आयोग के सलाहकार के रूप में अधिनियम का मसौदा तैयार करने में सहयोग दिया।
  3. उनकी महान कृति “Encyclopaedia Mundarica” (1903–1930) मुंडा जीवन, भाषा और परंपरा पर सबसे बड़ा दस्तावेज़ है।

होफमैन ने लिखा —

“Land is not a commodity to be sold; it is a trust shared by the ancestors and their descendants.”

यानी भूमि कोई व्यापारिक वस्तु नहीं, बल्कि पूर्वजों और वंशजों के बीच साझा उत्तराधिकार है।

✦ 11 नवंबर 1908 : CNT Act का लागू होना

कैंपबेल आयोग की सिफारिशों और होफमैन के अध्ययन के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने
“The Chotanagpur Tenancy Act, 1908” पारित किया।

इसका उद्देश्य था —

  1. आदिवासियों की भूमि पर बाहरी कब्ज़े को रोकना।
  2. पारंपरिक अधिकारों को वैधानिक रूप देना।
  3. किरायेदारी व्यवस्था को न्यायपूर्ण बनाना।

प्रमुख प्रावधान:

भूमि का हस्तांतरण केवल समान समुदाय के भीतर।

गैर-आदिवासी को भूमि देने से पहले उपायुक्त की अनुमति अनिवार्य।

पारंपरिक “खुंटकटी” और “भुइँहारी” रैयतों की कानूनी सुरक्षा।

यह कानून छोटानागपुर में आदिवासी स्वामित्व को वैधानिक मान्यता देने वाला पहला दस्तावेज बना।

✦ CNT Act : बिरसा के “अबुआ राज” की कानूनी अभिव्यक्ति

यद्यपि CNT Act औपनिवेशिक शासन का कानून था, पर इसके केंद्र में वही विचार था —

भूमि पर आदिवासी का सर्वोच्च अधिकार।

इस अधिनियम ने बिरसा के उलगुलान को स्थायी स्वरूप दिया।
यह संघर्ष से कानून बनने की दुर्लभ ऐतिहासिक मिसाल है।

✦ स्वतंत्र भारत में CNT Act की विरासत

स्वतंत्रता के बाद भी CNT Act को रद्द नहीं किया गया।
संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत यह आज भी प्रभावी है।

1950 के बाद भूमि सुधार कानून बने, पर CNT की धाराएँ जस की तस रहीं।
2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद यह कानून राज्य की आत्मा बन गया।

See also  DONYI–POLO : इतिहास, दर्शन और आधुनिक पुनर्जागरण का पूर्ण अध्ययन

✦ 2016 संशोधन विवाद और पथलगड़ी आंदोलन

2016 में झारखंड सरकार ने CNT और SPT Act में संशोधन कर भूमि के गैर-कृषि उपयोग की अनुमति देने का प्रयास किया।
जनता ने इसे “बिरसा की आत्मा पर हमला” कहा और पथलगड़ी आंदोलन शुरू हुआ।
गाँवों की सीमाओं पर पत्थर गाड़ दिए गए, जिन पर लिखा था —

राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने अंततः संशोधन को अस्वीकार कर दिया।
यह निर्णय इस कानून की जीवंतता का प्रमाण है।

✦ सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ

CNT Act केवल भूमि सुरक्षा का कानून नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का दस्तावेज़ है।
यह बताता है कि —

“भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं,
बल्कि जीवन, परंपरा और पूर्वजों की आत्मा का केंद्र है।”

✦ आलोचनाएँ और चुनौतियाँ

हालाँकि CNT Act ने भूमि सुरक्षा दी, फिर भी कई चुनौतियाँ हैं —

भूमि विवादों में नौकरशाही विलंब और भ्रष्टाचार।

खनन और औद्योगिक परियोजनाओं से टकराव।

कई आदिवासी अपने कानूनी अधिकारों से अब भी अनभिज्ञ हैं।

फिर भी यह कानून झारखंड की अस्मिता का प्रहरी है।

✦ निष्कर्ष : 11 नवंबर की ऐतिहासिक विरासत

छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 कोई साधारण तिथि नहीं —
यह बिरसा मुंडा के संघर्ष, फादर जॉन हॉफमैन के लेखन और जनप्रतिरोध की ऊर्जा से निर्मित कानून है।

“बिरसा ने संघर्ष दिया,
होफमैन ने शब्द दिए,
और इतिहास ने उसे कानून बना दिया।”

आज जब झारखंड अपनी भूमि, पर्यावरण और अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत है,
तो 11 नवंबर हमें याद दिलाता है —
कभी-कभी कानून भी किसी क्रांति की संतान होता है।

✦ तथ्य-सार (Fact File)

अधिनियम लागू हुआ: 11 नवंबर 1908

धाराएँ: 271

मुख्य संशोधन: 1929, 1938, 1948, 1969

अब तक कुल संशोधन: 57

ड्राफ्ट निर्माता: फादर जॉन बैप्टिस्ट होफमैन

आधार अधिनियम: बंगाल काश्तकारी अधिनियम, 1885

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

10 most Expensive cities in the World धरती आबा बिरसा मुंडा के कथन