राँची में सरहुल जुलूस का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

राँची में सरहुल जुलूस का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

परिचय सरहुल, झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों का प्रमुख पर्व है। यह प्रकृति और पूर्वजों की पूजा का उत्सव है, जिसे मुख्य रूप से उरांव, मुंडा और हो समुदाय बड़े उत्साह से मनाते हैं। राँची, जो झारखंड की राजधानी है, में सरहुल जुलूस का एक विशिष्ट ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि आदिवासी पहचान और एकता का भी प्रतीक बन चुका है।

सरहुल का महत्व और परंपरा

सरहुल पर्व चैत्र मास में उस समय मनाया जाता है जब साल वृक्षों में नई कोंपलें फूटती हैं। यह त्योहार नई फसल, जल, जंगल और जमीन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर होता है। सरना स्थल पर सामूहिक पूजा के बाद ग्राम प्रधान (पाहन) साल फूल अर्पित कर देवी-देवताओं को प्रसन्न करने की प्रार्थना करता है। सरहुल को कुड़ुख में खदी (Khaddi), संथाली में बाहा (Baha), खड़िया में जनकोर (Jankor), हो और मुंडारी में बा आदि नामों से जाना जाता है।

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राँची में सरहुल जुलूस की सामूहिक शुरुआत

राँची में सरहुल जुलूस की परंपरा वर्षों पुरानी है, लेकिन इसे संगठित रूप से मनाने का श्रेय प्रमुख आदिवासी नेता कार्तिक उरांव और डॉ. रामदयाल मुंडा को जाता है।

1960 के दशक में, कार्तिक उरांव ने राँची में हातमा से सिरमटोली तक सरहुल जुलूस निकालने की परंपरा की शुरुआत की। उन्होंने आदिवासी समुदाय के सामाजिक संगठन ‘पड़हा’ को पुनर्संगठित किया और ‘पड़हा’ नामक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन भी किया। यह आयोजन धीरे-धीरे पूरे राँची में लोकप्रिय हुआ और शहर के विभिन्न इलाकों में सामूहिक रूप से मनाया जाने लगा।

1980 के दशक में, डॉ. रामदयाल मुंडा के प्रयासों से सरहुल शोभायात्रा को और अधिक संगठित स्वरूप मिला। उन्होंने इसे केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित न रखते हुए, इसे आदिवासी संस्कृति और पहचान के प्रदर्शन के मंच के रूप में स्थापित किया। डॉ. मुंडा स्वयं मांदर लेकर शोभायात्रा में शामिल होते थे, जिससे लोगों को अपनी सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व करने की प्रेरणा मिली। उनके प्रयासों से सरहुल न केवल झारखंड बल्कि देश के अन्य भागों में भी प्रसिद्ध हुआ।

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जुलूस की विशेषताएँ

हर वर्ष सरहुल के दिन राँची में भव्य जुलूस निकाला जाता है। इसमें पारंपरिक वेशभूषा, नृत्य, गीत-संगीत और आदिवासी संस्कृति के विभिन्न रंग देखने को मिलते हैं। आदिवासी युवक-युवतियाँ पारंपरिक वाद्ययंत्रों (मांडर, नगाड़ा, ढोल) के साथ नृत्य करते हुए शहर की प्रमुख सड़कों से गुजरते हैं।

सरहुल जुलूस के प्रमुख पड़ावों में राँची का मुख्य सरना स्थल, अल्बर्ट एक्का चौक, फिरायालाल चौक और अन्य महत्वपूर्ण स्थान शामिल हैं। इस दिन पूरे शहर में आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिलती है, और यह आयोजन विभिन्न समुदायों को जोड़ने का कार्य करता है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य

वर्तमान समय में सरहुल जुलूस केवल धार्मिक पर्व तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, अधिकारों और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक भी बन चुका है।

सरहुल जुलूस में अब गैर-आदिवासी समुदायों की भी भागीदारी देखने को मिलती है, जिससे यह एक बहु-सांस्कृतिक आयोजन बन गया है। इसके साथ ही, यह त्योहार आदिवासी जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों की मांग का मंच भी बन चुका है।

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राँची में सरहुल जुलूस का इतिहास एक जीवंत परंपरा की कहानी है, जो आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना को दर्शाता है। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आदिवासी एकता, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक धरोहर को बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। यह उत्सव हमें प्रकृति और समाज के बीच संतुलन स्थापित करने का संदेश देता है।

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